Niti Aayog
संसद की अवहेलना
भारत में गरीबी मापने के एक दशक पुराने वादे से चुपचाप पीछे हटी मोदी सरकार
स त्तासीन नेता संसद में बैठ कर जनता को कई आश्वासन देते हैं। इस श्रृंखला में द कलेक्टिव इस बात की जांच कर रहा है कि उन आश्वासनों का क्या हुआ, क्योंकि हमने अपने पाठकों से वादा किया है कि हम शक्तिशाली लोगों की जवाबदेही तय करेंगे।
नई दिल्ली: सार्वजनिक रूप से नरेंद्र मोदी सरकार दावा करती है कि उसने पिछले एक दशक में बड़ी संख्या में भारतीयों को गरीबी से बाहर निकाला है। कई अर्थशास्त्री इस दावे को गलत बताते हैं और कहते हैं कि कोविड के बाद भारत की आर्थिक रिकवरी K-आकार की हो गई है, जिसमें अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब होते जा रहे हैं।
सरकार और उसके समर्थकों के लिए इस दावे को साबित करने का एक तरीका है यह आकलन करना कि 2014 के बाद से कितने लोग सरकार द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा से ऊपर आए हैं। औसत मासिक व्यय के एक निश्चित स्तर को गरीबी रेखा माना जाता है, और उससे नीचे रह रहे भारतीयों को गरीब माना जाता है।
लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि 2016 में प्रधानमंत्री द्वारा गठित टास्क फोर्स की सिफारिशों के बावजूद, केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर भारत की गरीबी रेखा पर कोई फैसला नहीं किया है।
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पिछले एक दशक के संसदीय रिकॉर्ड की समीक्षा की और पाया कि कम से कम छह बार केंद्र सरकार से गरीबी रेखा के बारे में पूछा गया। हर बार उसने जवाब टाल दिया। जब सरकारी आश्वासनों पर संसदीय समिति ने बाद में उससे जवाब मांगा तो सरकार ने हर बार आश्वासन खारिज करने पर जोर दिया। छह में से पांच बार सरकार सफल रही।
उपरोक्त टास्क फोर्स का गठन गरीबी से निपटने के उपायों का सुझाव देने के लिए किया गया था। टास्क फोर्स ने 2016 में अपनी रिपोर्ट प्रधान मंत्री कार्यालय को सौंपी, जिसमें उसने गरीबी मापने पर जोर दिया। आश्वासनों पर संसदीय समिति की 100 से अधिक रिपोर्टों की समीक्षा से पता चलता है कि सरकार ने टास्क फोर्स की सभी सिफारिशों के कार्यान्वयन पर पूछे गए सवालों को कम से कम 16 बार टाल दिया।
आश्वासनों पर समिति की आलोचना के बावजूद सरकार ने नई गरीबी रेखा के सवाल को लंबित रखा है। समिति ने एक बार कहा था कि "राष्ट्रीय महत्व के जरूरी मुद्दे" पर सरकार की स्थिति और तर्क “अस्वीकार्य” हैं।
क्यों जरूरी है गरीबी रेखा?
क्या एक आधिकारिक गरीबी रेखा केवल अर्थशास्त्रियों के बहस करने लिए एक सांख्यिकीय प्रयोग है? नहीं, आधिकारिक गरीबी रेखा न होने के कारण भारत के नागरिकों, विशेषकर गरीबों पर वास्तविक प्रभाव पड़ा है।
सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने कई बार दावा किया है कि 2014 के बाद से गरीबी कम हुई है। ऐसे आधिकारिक लेकिन निराधार दावों को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उन लाभार्थियों की संख्या न बढ़ाई जाए जिन्हें कोविड महामारी के दौरान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत कानूनी अधिकार के रूप में मुफ्त या सब्सिडी पर राशन दिया जा रहा था।
जैसा कि द कलेक्टिव ने पहले भी रिपोर्ट किया है, सरकार ने नीति आयोग का तर्क स्वीकार कर लिया कि भारत की प्रति व्यक्ति आय में 33.4% वास्तविक वृद्धि हुई है, जिसके कारण निश्चित रूप से बड़ी संख्या में परिवारों की आय बढ़ी है -- यानी हो सकता है कि जिन लोगों को सब्सिडी वाला राशन मिलना चाहिए उनकी संख्या में वास्तविक कमी आई है। चौंकाने वाली बात यह है कि प्रति व्यक्ति आय एक औसत है।
इसमें तब भी वृद्धि हो सकती है जब अमीर और अमीर हो जाएं जबकि गरीब और गरीब हो जाएं, जैसा कि अर्थशास्त्रियों का दावा है कि कोविड-19 महामारी के बाद हुआ।
वैसे तो भारत की जनता नेताओं के ऐसे बड़े-बड़े वादों की आदी हो चुकी है जिनको पूरा करना संभव नहीं लगता, लेकिन संसद में दिए गए आश्वासनों का एक आदर और महत्व होता है, जिसे सरकारी जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रणाली द्वारा बरकरार रखा जाता है। "पार्लियामेंट डिफाइड" यानि "संसद की अवहेलना" हमारी खोजी श्रृंखला है जिसमें हम इन संसदीय वादों पर प्रकाश डालते हैं और उनके परिणामों का पता लगाते हैं।
पिछले पांच सालों में 55 मंत्रालयों को कवर करने वाली हजारों पन्नों की 100 से अधिक संसदीय रिपोर्टों के विस्तृत विश्लेषण के बाद, हमारे संवाददाताओं ने सरकारी आश्वासनों की असलियत को उजागर किया है।
सरकार यह बनावटी तर्क धराशायी हो गया होता यदि उसने वह दो चीजें की होतीं जिनके लिए वह बाध्य है: 2021 के बाद प्रारूप के अनुसार जनगणना और गरीबी रेखा का संशोधन। लेकिन सरकार अभी भी सब्सिडी पर राशन देने के लिए लाभार्थियों (80 करोड़ से कुछ अधिक) का अनुमान लगाने के लिए 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग कर रही है।
आधिकारिक गरीबी रेखा की आवश्यकता के बारे में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गठित टास्क फोर्स ने कहा था: "आधिकारिक गरीबी रेखा और उसके फलस्वरूप गरीबों की संख्या का आधिकारिक अनुमान होने से पब्लिक पॉलिसी का ध्यान एक निश्चित समूह के आस-पास केंद्रित रहता है जिसपर सभी सहमत होते हैं।" लेकिन सरकार ने इस पर कार्रवाई नहीं की।
नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में गठित समिति ने सरकार को सुझाव दिया कि यदि वह पिछली यूपीए सरकार की गरीबी रेखा का पालन नहीं करना चाहती तो एक विशेषज्ञ समूह गठित करके गरीबी रेखा का निर्धारण करे।
संसद में उठे सवाल
29 जुलाई 2016 को श्रीकांत एकनाथ शिंदे और राजेशभाई चुडासमा ने योजना मंत्री से पूछा कि क्या नीति आयोग ने नई गरीबी रेखा को परिभाषित करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव दिया है और यदि हां, तो उसकी रिपोर्ट कब आएगी।
जवाब में, सरकार ने कहा कि "विशेषज्ञों के पैनल का गठन अभी नहीं किया गया है।" आश्वासन समिति ने इसे एक आश्वासन माना। यहां सरकार उसी पैनल की बात कर रही थी, जिसकी सिफारिश पनगढ़िया टास्क फोर्स ने एक महीने पहले जून 2016 में प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपी गई रिपोर्ट में की थी।
कुछ महीने बाद, पनगढ़िया टास्क फोर्स पर सांसद एमके राघवन ने एक और सवाल उठाया। वह गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या के बारे में जानना चाहते थे। उन्होंने यह भी पूछा कि सरकार इस संख्या का निर्धारण कैसे कर रही है और क्या देश में गरीबों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए कोई टास्क फोर्स है। जवाब में सरकार ने पहले यूपीए काल का डेटा प्रस्तुत किया, और उसकी अपनी टास्क फोर्स के सवाल पर, सरकार ने केवल इतना कहा कि "टास्क फोर्स की रिपोर्ट सरकार के पास विचाराधीन है"।
इसके बाद (नीति आयोग को प्रशासित करने वाले) योजना मंत्रालय से विशेष रूप से छह बार नई गरीबी रेखा के निर्धारण के बारे में और 10 बार गरीबी उन्मूलन पर टास्क फोर्स के बारे में पूछा गया। हर बार, योजना मंत्रालय के राज्य मंत्री ने अलग-अलग तरह से वही उत्तर दोहराया और कहा कि टास्क फोर्स की रिपोर्ट से पता चलता है कि गरीबी रेखा के निर्धारण के संबंध में अंतिम निर्णय लेने से पहले, गरीबी पर देश के शीर्ष विशेषज्ञों द्वारा अधिक गहराई से विचार किया जाना चाहिए।
आठ साल तक सरकार संसद को बताती रही कि 'वह अभी भी रिपोर्ट पर विचार-विमर्श कर रही है'।
अंततः 2019 में संसदीय समिति ने गरीबी रेखा पर निष्क्रियता को लेकर नीति आयोग की आलोचना की। उसने कहा, "(आश्वासन) समिति का मानना है कि यह राष्ट्रीय महत्व का जरूरी मुद्दा है और इसका निपटारा करने के लिए तेजी से प्रगति करने की जरूरत है।"
इस आलोचना के दो साल बाद भी, सरकार ने एक ही बार में टास्क फोर्स पर दिए गए 10 आश्वासनों को खारिज करने का अनुरोध किया। सरकार ने संसदीय समिति को बताया कि (टास्क फोर्स की) रिपोर्ट "भारत सरकार के पास अंतिम निर्णय के लिए लंबित है, इसलिए नीति आयोग के आश्वासनों को पूरा करना संभव नहीं है"।
नीति आयोग और उसके प्रशासक मंत्रालय ने इस मुद्दे से पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने संकेत दिया कि निर्णय प्रधानमंत्री पर निर्भर है। इस दलील से सरकार सभी 10 आश्वासनों को खारिज कराने में सफल रही।
प्रधानमंत्री मोदी फिर से सत्ता में आ गए हैं। रोज़गार की दीर्घकालिक कमी और महामारी के दौरान सख्त लॉकडाउन के आर्थिक झटकों के बावजूद, मोदी के मंत्री और समर्थक ऐतिहासिक गरीबी उन्मूलन का दावा करने के लिए दूसरे आंकड़ों और संख्याओं का उपयोग करते हैं।
इनमें से एक है नीति आयोग का 'बहुआयामी गरीबी सूचकांक' -- यह सूचकांक भारत में गरीबी का आकलन करने के लिए आंकड़े देने के अलावा बाकी सब कुछ करता है। पनगढ़िया टास्क फोर्स ने खुद स्पष्ट रूप से कहा था कि "पोषण, आवास, पेयजल आदि गरीबी के विभिन्न अंगों पर हुई प्रगति" को ट्रैक करना गरीबी रेखा निर्धारण में "सहायक" हो सकता है, लेकिन इसकी "जगह नहीं ले सकता"। बहुआयामी गरीबी सूचकांक ऐसे ही काम करता है।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य बिबेक देबरॉय ने हाल ही में बहुआयामी गरीबी सूचकांक के बारे में कहा कि "यह पूरी तरह से एक गरीबी रेखा नहीं है"।
"हमें पूछने चाहिए कि क्या हमें एक नई गरीबी रेखा की जरूरत है जिस पर यह डेटा लागू किया जा सके?" हाल ही में जारी पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वेक्षण के डेटा का जिक्र करते उन्होंने कहा। अर्थशास्त्री गरीबी रेखा का उपयोग एक बेंचमार्क की तरह उपभोग व्यय सर्वेक्षण में करते हैं और पता लगाते हैं कि किसी निश्चित समय में देश में कितने लोग गरीब हैं।
भारत ने पहली बार 1979 में गरीबी रेखा को अपनाया था। आखिरी आधिकारिक गरीबी रेखा, जिसे तेंदुलकर गरीबी रेखा कहा जाता है, 2009 में अपनाई गई थी। यूपीए के नेतृत्व वाली सरकार ने गरीबी की सीमा बेहद नीचे रखी थी: ग्रामीण भारत में प्रतिदिन 27 रुपए और शहरी क्षेत्रों में 33 रुपए की आय, जिसके कारण इसे जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 2012 में सरकार ने एक नई समिति गठित की जिसे रंगराजन समिति कहा गया। जून 2014 में इस समिति ने ग्रामीण भारत में गरीबी रेखा प्रतिदिन 32 रुपए और कस्बों और शहरों में 47 रुपए करने का सुझाव दिया।
औसतन इतनी मामूली रकम से भी अधिक खर्च करने वालों को गरीब नहीं माना जाएगा। तब तक मोदी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आ चुकी थी।
मोदी ने गरीबी उन्मूलन के लिए पनगढ़िया टास्क फोर्स का गठन किया जिसका काम गरीबी रेखा की समीक्षा करना था। टास्क फोर्स इसपर कोई निर्णय नहीं ले पाई -- उसने गरीबी रेखा निर्धारित करने के लिए एक और विशेषज्ञ समिति की मांग की।
आज तक मोदी सरकार ने आधिकारिक गरीबी रेखा निर्धारित नहीं की है। भारत के गरीबों की सही संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है।
यह वादे भी नहीं हुए पूरे
फरवरी 2015 में नीति आयोग ने अपने उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में कृषि विकास पर एक टास्क फोर्स का गठन किया। इसका गठन अन्य उद्देश्यों के अलावा, "कृषि के सभी पहलुओं को पुनः सशक्त करने" हेतु सुधारों का सुझाव देने के लिए हुआ था।
एक साल बाद, एक सांसद ने सरकार से पूछा कि क्या वास्तव में ऐसी कोई समिति गठित की गई है और उसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं। जवाब में सरकार ने कहा कि "रिपोर्ट को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है"। इसे सरकारी आश्वासनों पर लोकसभा समिति ने एक आश्वासन माना।
दो महीने बाद, मई 2016 में समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंप दी। लेकिन सरकार आश्वासन पर चुप्पी साधे रही। रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है लेकिन समिति ने एक पेपर जारी किया है जिसका विषय है "कृषि उत्पादकता में वृद्धि और किसानों के लिए खेती को लाभकारी बनाना"। पेपर में कुछ सुझाव मुख्य रूप से दिए गए हैं, जैसे "प्राइस डेफिशियेंसी पेमेंट सिस्टम", यानी लागत में घाटे का भुगतान करना। इस व्यवस्था में सरकार किसान को फसल के बाजार मूल्य और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच के अंतर का भुगतान करेगी, यदि फसल का बाजार मूल्य सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मूल्य से नीचे चला जाता है।
तीन साल बाद, मई 2019 में सरकार ने संसदीय समिति को सूचित किया कि रिपोर्ट पीएमओ के पास है और अभी भी "वहां अंतिम निर्णय के लिए लंबित है"।
आश्वासन पहली बार दिए जाने के 52 महीने बाद जुलाई 2020 में उसे हटा दिया गया।
लगभग एक दशक बाद, टास्क फोर्स की रिपोर्ट अभी भी प्रधानमंत्री कार्यालय में धूल फांक रही है। जबकि ग्रामीण इलाकों में मजदूरी दो साल से लगातार घट रही है और हर घंटे एक किसान आत्महत्या कर रहा है।
60 महीनों के बाद, आश्वासन खारिज कर दिया गया।
फरवरी 2021 में भाजपा के अशोक कुमार रावत ने लोकसभा में सरकार से पूछा कि देश में, विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में कितना केंद्रीय निवेश किया गया है। उन्होंने उन राज्यों की सूची भी मांगी जिन्हें दूसरों की तुलना में कम केंद्रीय निवेश मिला है और इस असमानता के कारण बताने को भी कहा।
सरकार का जवाब था कि "जानकारी एकत्र की जा रही है"। यह एक आश्वासन बन गया।
लेकिन पर्दे के पीछे, संसदीय आश्वासन समिति के सामने सरकार का रुख बदल गया। सरकार ने कहा कि "वित्त मंत्रालय" सहित "संबंधित मंत्रालयों" से डेटा मांगा गया था लेकिन कुछ प्राप्त नहीं हुआ। इसके बाद सरकार ने सवाल को ही खारिज करने की मांग की। और कहा कि "केंद्रीय निवेश का मतलब स्पष्ट नहीं है और इसके लिए डेटा प्राप्त करना मुश्किल है"।
22 महीनों के बाद आश्वासन हटा दिया गया।
विभिन्न राज्यों के साथ यह तथाकथित असमान व्यवहार एक ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। हाल ही में केरल और कर्नाटक ने केंद्र सरकार द्वारा फंड रोके जाने पर विरोध जताया था। द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पहले खुलासा किया था कि कैसे प्रधानमंत्री ने चुपचाप भारत में राज्यों के साथ बांटे जाने वाले केंद्रीय करों की राशि को कम करने की कोशिश की थी।
This is the concluding part of the Parliament Defied investigative series
आश्वासनों का डाटाबेस
◍ ड्रॉप किया गया
आश्वासन कब दिया गया : 10.02.2021
समिति ने इसे कब हटाया : 27.07.2023
सदन : लोकसभा
कुल लंबित अवधि : 29 महीने
◍ ड्रॉप किया गया
आश्वासन कब दिया गया : 07.05.2015
समिति ने इसे कब हटाया : 22.12.2022
सदन : लोकसभा
कुल लंबित अवधि : 91 महीने
◍ ड्रॉप किया गया
आश्वासन कब दिया गया : 23.11.2016
समिति ने इसे कब हटाया : 05.08.2022
सदन : लोकसभा
कुल लंबित अवधि : 69 महीने
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